दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी एक ऐसी कहानी है जो समाज के उस कोने को छूती है, जिस पर अक्सर बात करने से लोग कतराते हैं। उम्र के उस पड़ाव पर, जहां रिश्तों को ‘ख़त्म’ मान लिया जाता है, वहीं दुर्लभ प्रसाद (संजय मिश्रा) अपनी ज़िंदगी को एक दूसरा मौका देना चाहता है। जिसकी वजह आप जब फिल्म देखेंगे जान पाएंगे।
यह फिल्म सिर्फ शादी की कहानी नहीं है, बल्कि अकेलेपन, परिवार, समाज की सोच और दोबारा शुरू करने के साहस की कहानी है। बनारसी पृष्ठभूमि में रची गई यह सॉफ्ट, संवेदनशील और हल्की-फुल्की हास्य से भरी कहानी दिल को छू जाती है।
अभिनय (Acting):
संजय मिश्रा एक बार फिर साबित करते हैं कि वह क्यों इस दौर के सबसे भरोसेमंद कलाकार हैं। दुर्लभ प्रसाद के किरदार में उनकी सादगी, हास्य और भावनात्मक गहराई फिल्म की रीढ़ है। संजय मिश्रा जी ने साबित किया एक ओल्ड वाइन को क्यों अच्छा माना जाता है।
महिमा चौधरी का कमबैक सुखद है। दिल लूटती मुस्कुराती आंखें, वही अदाएं, नज़ाकत, जो हमें दिल से प्यार करने के लिए मजबूर कर दे। उनकी और संजय मिश्रा की जोड़ी पर्दे पर बेहद सहज और असरदार लगती है। दोनों के बीच का भावनात्मक तालमेल फिल्म को खास बनाता है।
व्योम यादव इस फिल्म का सरप्राइज़ पैकेज हैं। ‘मन्नू क्या करेगा?’ के बाद एक बार फिर वह साबित करते हैं कि बॉलीवुड को एक इंटेलिजेंट और संवेदनशील युवा अभिनेता मिल गया है। दुर्लभ प्रसाद के बेटे के रूप में उनका अभिनय बेहद स्वाभाविक और प्रभावशाली है। भविष्य के लिए एक बेहद प्रॉमिसिंग टैलेंट हैं व्योम। व्योम का इश्क़ दुर्लभ प्रसाद की ज़िंदगी में क्या दुर्लभ संयोग ले कर आता है इस फिल्म की कहानी वो देख कर आपका दिल खुशी से झूम उठेगा।
पल्लक लालवानी एक बहुत ही खूबसूरत अभिनेत्री जो उसी खूबसूरती से संवाद बोलती हैं कि आपकी नजर पर्दे पर उनसे नहीं हटती। महक का किरदार निभा रही पलक ने मुरली प्रसाद के प्यार का इम्तिहान किसी और ही अंदाज में लिया है, जो अपने आप में आपको फिल्म को अंत तक देखने के लिए मजबूर करेगा।
श्रीकांत वर्मा
ने मुरली प्रसाद के मामा और दुर्लभ प्रसाद के साले का काम किया है। वो रायते में बूंदी की तरह फिल्म में हर जगह आपको एंटरटेन करते दिखेंगे।
प्रवीण सिंह सिसौदिया जो कि बृज नारायण, महक के पिता की भूमिका में है। महक के पिता श्री बड़े ही आनंद के साथ दुर्लभ प्रसाद और मुरली प्रसाद दोनों पिता और बेटे के साथ खेल खेलते हैं।
अभय आनंद सिंह जो कि युवा दुर्लभ प्रसाद और अद्वितीय वर्मा जो कि
बबीता के बचपन का किरदार निभाते हैं, इन्होंने भीबछा काम किया है। अन्य सभी सहायक कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं में ईमानदार और संतुलित अभिनय करते हैं, जिससे फिल्म की दुनिया विश्वसनीय बनती है।
निर्देशन (Direction):
सिद्धांत राज सिंह का निर्देशन सधा हुआ और संवेदनशील है। उन्होंने कहानी को न तो ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामैटिक बनाया और न ही हल्का। भावनाओं और हास्य के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी बड़ी सफलता है।
लेखन और संवाद (Writing & Dialogues):
आदेश के अर्जुन और प्रशांत सिंह की लेखनी समाज की सच्चाई को सरल शब्दों में सामने लाती है। संवाद बनावटी नहीं लगते, बल्कि ज़िंदगी से निकले हुए महसूस होते हैं। कई जगह संवाद चेहरे पर मुस्कान और आंखों में नमी दोनों ले आते हैं।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर (Music & BGM):
अनुराग सैकिया का संगीत कहानी के मिज़ाज के साथ खूबसूरती से घुलता है। गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं, न कि रोकते हैं।
अरविंद नियोग का बैकग्राउंड म्यूज़िक भावनात्मक दृश्यों को और असरदार बनाता है।
सिनेमैटोग्राफी (Cinematography):
अनिल सिंह की सिनेमैटोग्राफी बनारस की गलियों, घाटों और घरों को जीवंत बना देती है। फ्रेम्स में एक देसी खुशबू और अपनापन है, जो फिल्म की आत्मा को मजबूत करता है।
कुल मिलाकर (Final Verdict):
दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी एक ऐसी फिल्म है जो शोर नहीं मचाती, बल्कि धीरे-धीरे दिल में उतरती है। यह फिल्म उम्र, रिश्तों और समाज की सोच पर एक सधा हुआ और संवेदनशील सवाल उठाती है। संजय मिश्रा और महिमा चौधरी की जमी हुई जोड़ी, व्योम यादव का शानदार अभिनय और ईमानदार निर्देशन इसे देखने लायक बनाता है।
अगर आप हल्की-फुल्की, भावनात्मक और दिल से बनी फिल्मों के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।
— अमन दीप वालिया , www.thenewsbox.co.in 9619704259
“उम्र चाहे जितनी भी हो, साथ और समझ की ज़रूरत कभी बूढ़ी नहीं होती…”



